Friday, March 24, 2023

मधुर वचन

                                              मधुर वचन


हम सभी मनुष्य जन्मते ही अपना मुख चलाना शुरू कर देते हैं, जिसका प्रमाण है जन्म लेते ही शिशु का रोना। बोलना हमारी स्वाभाविक क्रिया है, जो हमें करनी ही पड़ती है। यह बात और है कि कभी-कभी बाहर के शोर में हम इतने खो जाते हैं कि ईश्वर का स्वर हमें सुनाई ही नहीं पड़ता। इसीलिए ही महापुरुषों से हमें एक उत्तम राय मिलती है कि सप्ताह में या माह में एक दिन अवश्य मौन रहें, परंतु हम मुख को तो बंद कर लेते हैं, परंतु हमारे मन का बोलना बंद नहीं हो पाता। इसलिए ही तो अधिकतर डाक्टर सभी मरीजों को कहते हैं कि 'अपने मन को ज्यादा नहीं चलाओ।' अर्थात 'मन का मौन' करो।

कहते हैं कि बिना हड्डी की जीभ जब बोलने लगती हैं तो कइयों की हड्डियां तोड़ देती है। इसीलिए तो हमें यह बचपन से सिखाया जाता है कि पहले सोचो फिर बोलो, क्योंकि जैसे कमान से निकला हुआ तीर वापस नहीं आता, ठीक उसी तरह मुख से निकला हुआ वचन भी वापस नहीं लिया जा सकता। इसका सबसे श्रेष्ठ उदहारण है महाभारत की कथा, जिससे हमें यह सीख मिलती है कि कैसे एक जुबान के फिसलने से संकटकाल का निर्माण हो गया। इसीलिए 'कम बोलें-धीरे बोलें-मीठा बोलें।' हम जब भी कुछ बोलें तो हमारे वचन दूसरों के लिए सुखदायी हों, न कि कांटा चुभाने वाले दुखदायी ।

संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने कटु वचन बोलने के संस्कार के कारण अपने संबंधों में खटास पैदा कर ली है। इसलिए हमें सदैव सही समय और सही जगह पर सही शब्द का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने से न केवल हमारा मूल्य बढ़ेगा, अपितु हम सभी के हृदय में सम्मानित स्थान प्राप्त कर पाएंगे, परंतु यह संभव तभी हो पाएगा जब हम बोलने से पूर्व सोचने का संस्कार धारण करेंगे, क्योंकि जैसा हम सोचेंगे, वैसे ही हमारे बोल निकलेंगे। इसलिए किसी दुर्गति से बचने के लिए बोलने से पहले सोचें, न कि बोलने के बाद।

                                                                                                                        (राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी)

No comments:

Post a Comment

Easy to Earn 50 Pounds

          Easy to Earn 50 Pounds                                                                                                            ...